Std 11 Hindi Chapter 8 Tatsat Question Answer Maharashtra Board
Balbharti Maharashtra State Board Hindi Yuvakbharati 11th Digest Chapter 8 तत्सत Notes, Textbook Exercise Important Questions and Answers.
Hindi Yuvakbharati 11th Digest Chapter 8 तत्सत Questions And Answers
11th Hindi Digest Chapter 8 तत्सत Textbook Questions and Answers
आकलन
1. लिखिए :
प्रश्न अ.
बड़ दादा के अनुसार आदमी ऐसे होते हैं –
(a) ……………………………………
(b) ……………………………………
(c) ……………………………………
उत्तर:
(a) इन्हे पत्ते नहीं होते।
(b) इनमें जड़ें नहीं होती।
(c) अपने तने की दो शाखाओं पर ही वे चलते चले जाते हैं।
प्रश्न आ.
वन के बारे में इसने यह कहा –
(a) बड़ दादा ने –
(b) घास ने
(c) शेर ने
उत्तर :
(a) बड़ दादा ने – वन नामक जानवर को मैंने अब तक नहीं देखा।
(b) घास ने – वन को मैंने अलग करके कभी नहीं पहचाना।
(c) शेर ने – वन कोई नहीं है कहीं नहीं है।
प्रश्न इ.
घास की विशेषताएँ –
………………………………………………..
………………………………………………..
………………………………………………..
उत्तर :
(a) घास बुद्धिमती है।
(b) घास से किसी को शिकायत नहीं होती।
(c) उसे सबका परिचय पद तल के स्पर्श से मिलता है।
शब्द संपदा
2.
प्रश्न अ.
पर्यायवाची शब्दों की संख्या लिखिए :
जैसे – बादल – पयोधर, नीरद, अंबुज, जलज
(a) भौंरा – भ्रमर, षट्पद, भँवर, हिमकर
(b) धरा – अवनी, शामा, उमा, सीमा
(c) अरण्य – वन, विपिन, जंगल, कानन
(d) अनुपम – अनोखा, अद्वितीय, अनूठा, अमिट
उत्तर :
जैसे – बादल – पयोधर, नीरद, अंबुज, जलज ( 3 )
(a) भौंरा – भ्रमर, षट्पद, भँवर, हिमकर ( 3 )
(b) धरा – अवनी, शामा, उमा, सीमा ( 2 )
(c) अरण्य – वन, विपिन, जंगल, कानन ( 4 )
(d) अनुपम – अनोखा, अद्वितीय, अनूठा, अमिट ( 3 )
प्रश्न आ.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द तैयार कर उपसर्ग के अनुसार उनका वर्गीकरण कीजिए –
कामयाब – न्याय – मान
सत्य – मंजूर
मेल – यश – संग
उत्तर :
उपसर्ग | मूल शब्द | शब्द | |
उदा. – | गैर ना अ अप अ अव ना बे अप कु |
जिम्मेदार कामयाब न्याय मान सत्य गुण मंजूर मेल यश संग |
गैर जिम्मेदार नाकामयाब अन्याय अपमान असत्य अवगुण नामंजूर बेमेल अपयश कुसंग |
अभिव्यक्ति
3.
प्रश्न अ.
‘अभयारण्यों की आवश्यकता’, इस विषय पर अपने विचार लिखिए।
उत्तर :
कुछ दिन पहले अखबार में एक खबर आई थी कि मुंबई के ठाणे विभाग की मानवी बस्ती में एक बाघ आया था। इस खबर से लोगों में काफी सनसनी फैली थी। जंगली जानवरों का मानवी बस्ती में आगमन बढ़ रहा है, जिससे मनुष्यों का खतरा बढ़ रहा है। इस बात पर चर्चा होने लगी।
वास्तव में देखा जाए तो जंगली जानवरों के लिए हम खतरा बन रहे हैं। भौतिक विकास के नाम पर जंगलों को खत्म करने से बेचारे जानवरों का जीना हराम हुआ है। जंगलों में रहने वाले अनेक छोटे-छोटे जीव-जंतु अस्तित्वहीन हो रहे हैं। उनका निवास हमने छीन लिया है। इसलिए बेचारों को मानवी बस्ती में घुसना पड़ रहा है। इस कारण अभयारण्यों की आवश्यकता तीव्रता से महसूस हो रही है।
प्रश्न आ.
‘पर्यावरण और हम’, इस विषय पर अपना मत लिखिए।
उत्तर :
पर्यावरण मतलब क्या? सच पूछिए तो पर्यावरण हमसे ही बना है। हमारे आस-पास के वातावरण को ही पर्यावरण कहा जाता है। अगर पर्यावरण बिगड़ेगा तो हमारा भविष्य भी बिगड़ेगा। यह सब जानते हुए भी आज मनुष्य जंगल को हानि पहुँचा रहा है। जमीन के अंदर का पानी समाप्त कर रहा है और जमीन पर उपलब्ध पानी को प्रदूषित कर रहा है। हवा जहरीली बन रही है। ओझोन वायु की परत पतली हो रही है।
हमारे विकास के नाम पर पर्यावरण को नुकसान पहुँचाकर मानो हम अपने ही पैरों पर कुल्हाडी मार रहे हैं। इन प्राकृतिक संसाधनों की हानि से भविष्य में मनुष्य के जीवन में गंभीर चुनौतियाँ निर्माण हो सकती है। केदारनाथ पहाड़ी में हुई दुर्घटना हो, या हाल ही में कोकण में हुई दुर्घटना हो – इन जैसी घटनाओं से प्रकृति हमें इशारा दे रही है।
इन इशारों से अगर हम सावधान नहीं होंगे, प्रकृति की रक्षा नहीं करेंगे तो बाढ़, तूफान, भूचाल, सूखा इन जैसे प्राकृतिक संकटों का मनुष्य के अस्तित्व पर हमला संभव है। हमें यह जानना चाहिए कि अगर पर्यावरण सुरक्षित हो तो ही हम सुरक्षित रह पाएँगे।
पाठ पर आधारित लघूत्तरी प्रश्न –
4.
प्रश्न अ.
टिप्पणियाँ लिखिए –
(1) बड़ दादा
(2) सिंह
(3) बाँस
उत्तर :
(1) वड़ दादा : ‘तत्सत’ इस कहानी में एक घना जंगल है। इस जंगल में एक बड़ा पुराना बड़ का पेड़ है। उसे सब ‘बड़ दादा’ कहकर पुकारते हैं। बड़ दादा अंत्यंत शांत और संयमी है। वह सबसे स्नेह करता है। एक दिन बड़ दादा की छाँव में बैठे दो आदमियों ने कहा कि यह वन अत्यंत भयानक और घना है।
आदमी किस वन के बारे में बात कर रहे थे, यह जंगल वासी समझ नहीं पाए। वन किसे कहते है? वह कहाँ है? इसे जानने के लिए सब बेचैन थे। अनेक पेड़, प्राणियों के साथ बड़ दादा की चर्चा हुई। किसी को भी ‘वन’ के बारे में जानकारी नहीं थी। कुछ दिन बाद वही आदमी फिर दिखाई दिए।
बड़ ने उन्हें ‘वन’ के बारे में पूछा। आदमी ने बड़ के पेड़ पर चढ़कर ऊपरी हिस्से में खिले हुए नए पत्तों को आस-पास की दुनिया दिखाकर बड़ के कान में कुछ कहा। बड़ दादा को उस वक्त पता चला कि ‘वन’ माने कोई जानवर या पेड़-पौधे नहीं बल्कि उन सबसे वन बना है। वन हम में है और हम वन में हैं इस परम सत्य का उसे पता चला। आखिर वही ‘तत्सत’ था।
(2) सिंह : इस कहानी का सिंह ‘शक्ति’ का प्रतीक है। सिंह पराक्रमी है। वन का राजा है। उसे अपनी शक्ति पर गर्व है। जब बड़ दादा तथा अन्य उसे ‘वन’ के बारे में पूछते हैं तब उसे पता चलता है कि ‘वन’ नामक कोई है? उस ‘वन’ को उसने कभी नहीं देखा था। सिंह उस वन को चुनौती देना चाहता है।
अगर उसका ‘वन’ से मुकाबला हो जाए तो उसे फाड़कर नष्ट करना चाहता है। ‘वन’ को नष्ट करने की भाषा के पीछे उसका अज्ञान है। वन के अस्तित्व पर उसे भरोसा नहीं है। खुद की शक्ति पर अहंकार करने वाले सिंह के शब्द और कृति से उसका बल दिखाई देता है। शक्ति, वीरता, बल और अहंकार का प्रतीक ‘सिंह’ है।
(3) वाँस : ‘तत्सत’ कहानी में गहन वन है जहाँ के पेड़-पौधों को तथा पशुओं को ‘वन’ नामक जानवर के बारे में पता नहीं है। परंतु सबको उसका डर था क्योंकि शिकारियों ने ‘भयानक वन’ की बात आपस में की थी। वन के सभी ‘वन’ नामक भयानक जानवर के बारे में चर्चा कर रहे थे।
तब बाँस भी उस चर्चा में सम्मिलित हुआ। वह थोड़ी सी हवा आते ही खड़खड़ करने लगता था। वह पोला था परंतु बहुत कुछ जानता था। वह घना नहीं था, सीधा ही सीधा था। इसीलिए झुकना नहीं जानता था। उसे लगता था कि हवा उसके भीतर के रिक्त में वन-वन-वन-वन कहती हुई घूमती रहती है।
वाग्मी वंश बाबू अर्थात् बाँस ‘वन’ नामक भयानक प्राणी के बारे में अधिक बता न सके।
प्रश्न आ.
‘तत्सत’ शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
‘तत्सत’ यह कहानी प्रतीकात्मक है। यहाँ वन ईश्वर का प्रतीक है और वन में रहने वाले सभी प्राणी, पशु-पक्षी, पेड़ पौधे उसके अंश है। ‘वन’ के अस्तित्व को लेकर पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, इनसान में चर्चा छिड़ जाती है। आदमी का कहना है कि, ‘हम सब जहाँ है वहीं वन है। लेकिन पेड़-पौधे और पशु-पक्षी उसकी बात मानने को तैयार नहीं है। बड़ दादा की आदमी के साथ देर तक चर्चा होती है।
आखिर बड़ दादा को साक्षात्कार होता है और वह वन रूपी ईश्वर के अस्तित्व को मानने के लिए तैयार हो जाता है। बड़ दादा से मनुष्य ने जो कुछ कहा, मंत्र रूपी संदेश दिया तब मानो उसमें चैतन्य भर आया। उन्होंने खंड को कुल में देख लिया। उन्हें अपने चरमशीर्ष से कोई अनुभूति प्राप्त हुई।
सृष्टि के अंतिम सत्य को उन्होंने जान लिया। हम आज हैं कल नहीं परंतु ईश्वर है। ईश्वर हम सब में है। ईश्वर के अस्तित्व के बारे में उलझन और समाधान के बीच की उथल-पुथल को जंगल वासी और आदमियों के संवाद द्वारा लेखक ने साकार किया है।
हम सभी का अस्तित्व इस सृष्टि के लिए महत्त्वपूर्ण है परंतु अंत में उस परम शक्तिशाली का अस्तित्व हमें स्वीकार करना ही पड़ता है। यही सत्य है। इसीलिए कहानी का शीर्षक सार्थक है। ‘तत्सत’ का शब्दश: अर्थ है वही सत्य है अर्थात ईश्वर सत्य है।
साहित्य संबंधी सामान्य ज्ञान
5. जानकारी दीजिए:
प्रश्न अ.
जैनेंद्र कुमार जी की कहानियों की विशेषताएँ –
उत्तर :
जैनेंद्र कुमार जी की कहानियाँ किसी ना किसी मूल विचार तत्व को जगाती है। रोजमर्रा के जीवन की समस्याएँ आपकी कहानियों में उजागर होती हैं। मनोविश्लेषण (psychoanalysis) और मानवीय संवेदना यह आपकी कहानियों की प्रमुख विशेषताएँ हैं।
प्रश्न आ.
अन्य कहानीकारों के नाम –
उत्तर :
हिंदी साहित्य में जैनेंद्र कुमार जी के अलावा प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, अज्ञेय, यशपाल, मन्नू भंडारी, शेखर जोशी, भीष्म साहनी, फणीश्वरनाथ रेणु, मार्कण्डेय आदि अनेक कहानीकारों को श्रेष्ठ कहानीकार माना जाता है।
6. निम्नलिखित रसों के उदाहरण लिखिए :
(a) हास्य
……………………………………………………..
(b) वात्सल्य
……………………………………………………..
उत्तर :
(a) हास्य रस :
बुरे समय को देखकर गंजे तू क्यों रोय?
किसी भी हालत में तेरा बाल न बाँका होय।
(b) वात्सल्य रस :
मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ।
मोसौ कहत मोल को लीन्हौं,
तू जसुमति कब जायौ?
Yuvakbharati Hindi 11th Textbook Solutions Chapter 8 तत्सत Additional Important Questions and Answers
कृतिपत्रिका
(अ) निम्नलिखित गद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए :
गद्यांश : शीशम ने कहा, “ये लोग इतने ही ……………………………………………. वह चीतों से बढ़कर होगा।” (पाठ्यपुस्तक पृष्ठ क्र. 39-40) |
प्रश्न 1.
संजाल पूर्ण कीजिए :
उत्तर :
प्रश्न 2.
कारण लिखिए :
(i) आदमी ओछे रहते हैं, ऊँचे नहीं उठते …………………………………………….
उत्तर :
आदमी ओछे रहते हैं, ऊँचे नहीं उठते क्योंकि इनमें पेड़ों की तरह जड़ें नहीं होती।
(ii) वन चीतों से बढ़कर होगा …………………………………………….
उत्तर :
वन चीतों से बढ़कर होगा क्योंकि आदमी वन को भयानवा बताते थे।
प्रश्न 3.
निम्न शब्दों में अलग अर्थ वाला शब्द छाँटकर लिखिए :
उत्तर :
- समीर, अनिल, मारुति, हवा – मारुति
- दिन, तिथि, वार, वेद – वेद
- प्रीति, स्नेह, प्यार, चाह – चाह
- नारी, मनुष्य, आदमी, मानव – नारी
प्रश्न 4.
प्रकृति द्वारा निर्मित पेड़-पौधे, पशु-पक्षी का महत्त्व लिखिए।
उत्तर :
पेड़-पौधे, पशु-पक्षी का पर्यावरण संतुलन में अपना अलग महत्त्व है। पेड़-पौधे हो या पशु-पक्षी सभी को जीवित रहने के लिए आक्सीजन आवश्यक है और आक्सीजन बनाने में पेड़-पौधे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शुद्ध हवा के साथ-साथ फल-फूल, पानी, छाया, आसरा आदि के लिए पेड़ आवश्यक हैं।
पेड़ अपनी हजारों मशीनों (पत्तियों) द्वारा हवा शुद्ध करने के काम में। लगा है। पशु-पक्षी पेड़ के फल खाते हैं और फलों के बीज इधर-उधर डालकर नए वृक्ष उगाने में सहायक सिद्ध होते हैं। उनके मल-मूत्र से पेड़-पौधों को खाद मिल जाती है और वे भी फलते-फूलते हैं।
मनुष्य द्वारा फैलाए गए प्रदूषण को कम करने में इस तरह पेड़-पौधे और पशु-पक्षी अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं। ये इस धरती का शृंगार है जो हमें जीवन प्रदान करने में मददगार सिद्ध हुए हैं। अत: इनकी अहमियत समझकर इन्हें संरक्षण देना हम सबका कर्तव्य है।
(आ) निम्नलिखित गद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए :
गद्यांश : तब सबने घास से पूछा ……………………………………………………………………………………………………………. कैसे जाना जाए। (पाठ्यपुस्तक पृष्ठ क्र. 41) |
प्रश्न 1.
उत्तर लिखिए :
उत्तर :
- घास की विशेषता → बुद्धिमती
- वंश बाबू की विशेषता = वाग्मी
- भयानक जंतु का नाम → वन
- घास की इससे बनती है → दुख
प्रश्न 2.
लिखिए : घास के अनुसार पद तल के स्पर्श से सबका परिचय :
(i) ……………………………………..
(ii) ……………………………………..
उत्तर :
घास के अनुसार पद तल के स्पर्श से सबका परिचय :
(i) पद तल की चोट अधिक मात्रा में देने वाला ताकतवर
(ii) धीमे कदम से चलने वाला दुखियारा
प्रश्न 3.
(i) विलोम शब्द लिखिए :
(1) कठिनाई x ……………………………….
(2) धीमा x ……………………………….
उत्तर :
(1) कठिनाई x आसानी
(2) धीमा x तेज
(ii) अनेक शब्दों के लिए एक शब्द लिखिए :
उत्तर :
(1) जानने की इच्छा रखने वाला – जिज्ञासु
(2) दुःख में फँसा हुआ – दुखियारा
प्रश्न 4.
‘जंगल बचाओ’ इस विषय पर अपने विचार लिखिए।
उत्तर :
दो साल पहले हम लोग कोंकण में गए थे। समुद्र के साथ-साथ वहाँ हम एक घने जंगल को भी देखने गए थे। उस घने जंगल को देखकर हम लोग सचमुच हैरान हो गए। बड़े-बड़े, विशाल वृक्ष, हजारों तरह के पेड़-पौधे, अनेक प्रकार के छोटे-छोटे जीव-जंतु देखने का मौका हमें मिला।
पेड़ की शाखाएँ दूर-दूर तक फैली हुई थी। पेड़ के नीचे फल-फूल बिखरे हुए थे। अलगअलग पछियों की चहचहाट से मन पुलकित हो रहा था। एक अनोखा सुकून, महसूस हो रहा था। तब से मुझे हमेशा लगता है कि ‘जंगल’ बचाना बहुत जरूरी है।
सिर्फ हमारी अंदरूनी सुकून के लिए नहीं बल्कि उन सारे जीव-जंतुओं के लिए भी जिनकी जिंदगी जंगल पर निर्भर है। आज हम अपने स्वार्थ के लिए जंगल बरबाद कर रहे हैं। हमारी भौतिक जिंदगी आबाद हो रही है। जंगल की लकड़ियाँ तोड़कर हम तो एक से एक बड़ी इमारतें खड़ी कर रहे हैं किंतु जानवरों का निवास नष्ट हो रहा है। आजकल शेर, हाथी, बंदरों का मानवी बस्ती में घुसना आम बात हो गई है। इन सबको बचाना हमारा कर्तव्य है।
अत: ‘जंगल बचाओ’ यह अभियान चलाने की जरूरत है।
(ई) निम्नलिखित गद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए :
गद्यांश : उन दोनों आदमियों में से प्रमुख ने विस्मय से …………………………………………………………………………. ‘तो क्या मरोगे?’ (पाठ्यपुस्तक पृष्ठ क्र. 43) |
प्रश्न 1.
संजाल पूर्ण कीजिए :
उत्तर :
प्रश्न 2.
निम्न उद्गार कहने वालों का नाम लिखिए :
उत्तर :
- “बको मत – बबूल
- “यह सब कुछ ही वन है।” – प्रमुख पुरुष
- “ठीक बताओ, नहीं तो तुम्हारी खैर नहीं है।” – कई जानवर
- “तो क्या मरोगे?’ – आदमी
प्रश्न 3.
विशेषण-विशेष्य की उचित जोड़ियाँ गद्यांश के आधार पर मिलाइए : (आदमी, बोली, पुरुष, सिंह, प्रमुख, वनराज, बेचारे, मानवी)
उत्तर :
- आदमी बेचारे
- वोली मानवी
- पुरुष – प्रमुख
- सिंह – वनराज
प्रश्न 4.
‘पर्यावरण और हम’ इस विषय पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर :
पर्यावरण मतलब क्या? सच पूछिए तो पर्यावरण हमसे ही बना है। हमारे आस-पास के वातावरण को ही पर्यावरण कहा जाता है। अगर पर्यावरण बिगड़ेगा तो हमारा भविष्य भी बिगड़ेगा। यह सब जानते हुए भी आज मनुष्य जंगल को हानि पहुँचा रहा है। जमीन के अंदर का पानी समाप्त कर रहा है और जमीन पर उपलब्ध पानी को प्रदूषित कर रहा है। हवा जहरीली बन रही है। ओझोन वायु की परत पतली हो रही है।
हमारे विकास के नाम पर पर्यावरण को नुकसान पहुँचाकर मानो हम अपने ही पैरों पर कुल्हाडी मार रहे हैं। इन प्राकृतिक संसाधनों की हानि से भविष्य में मनुष्य के जीवन में गंभीर चुनौतियाँ निर्माण हो सकती है। केदारनाथ पहाड़ी में हुई दुर्घटना हो, या हाल ही में कोकण में हुई दुर्घटना हो – इन जैसी घटनाओं से प्रकृति हमें इशारा दे रही है।
इन इशारों से अगर हम सावधान नहीं होंगे, प्रकृति की रक्षा नहीं करेंगे तो बाढ़, तूफान, भूचाल, सूखा इन जैसे प्राकृतिक संकटों का मनुष्य के अस्तित्व पर हमला संभव है। हमें यह जानना चाहिए कि अगर पर्यावरण सुरक्षित हो तो ही हम सुरक्षित रह पाएँगे।
पाठ पर आधारित लघूत्तरी प्रश्न :
प्रश्न अ.
टिप्पणियाँ लिखिए।
उत्तर :
(1) साँप : इस कहानी का सर्पराज अर्थात साँप वन का वासी है। वह हमेशा धरती से चिपककर रहता है। चमकीला देह और टेढ़ामेढ़ापन यह उसकी शारीरिक विशेषता है। जहाँ भी छिद्र हो वहाँ उसका प्रवेश हो सकता है। धरती के सारे गर्त को वह जानता है। धरती से पाताल तक उसका वास रहता है।
लेकिन इतना होने पर भी उसे ‘वन’ के बारे में कुछ ज्ञान नहीं है। साँप के मतानुसार ‘वन’ फर्जी है। धरती के गर्त में ज्ञान की खान है। जहाँ सिर्फ साँप पहुँचता है इसलिए साँप इस कहानी में ‘ज्ञान’ का प्रतीक माना गया है। उसे धरती के अनेक रहस्यों का ज्ञान है। परंतु ‘वन’ के बारे में उसे कुछ पता नहीं है।
(2) घास : ‘तत्सत’ कहानी एक प्रतीकात्मक कहानी है। इस कहानी के अनेक पात्र किसी विशेष गुणों का प्रतीक है। कहानी की ‘घास’ एक सर्वव्यापी वनस्पति है। वह हर जगह व्याप्त है। वह ऐसी बिछी रहती है कि किसी को उससे शिकायत नहीं होती। लोगों की जड़ों को वह जानती है।
पद-तल के स्पर्श से घास सबको पहचानती है। जब उसके सिर पर किसी का स्पर्श इतना जोरदार होता है कि उसे चोट पहुंचे तो वह पहचानती है कि वह ताकतवर है। धीमे कदमों से अगर कोई घास पर से चलता है तो वह जान लेती है कि कोई दुखियारा जा रहा है। दुख से घास का अपनेपन का रिश्ता है।
इस कहानी में ‘घास’ ‘बुद्धिमती’ है, अर्थात बुद्धि का प्रतीक है।
तत्सत Summary in Hindi
तत्सत लेखक परिचय :
प्रेमचंदोत्तर उपन्यास (novel) में लेखक जैनेंद्र कुमार जी का एक विशिष्ट स्थान है। आपका जन्म 2 जनवरी 1905 को अलीगढ़ में हुआ। मनोविज्ञान और दर्शन आपके साहित्य का आधार है। हिंदी उपन्यास के इतिहास में मनोविश्लेषणात्मक परंपरा के प्रवर्तक (promoter) के रूप में आप प्रसिद्ध है। पद्मभूषण से आप सम्मानित हैं। आपका देहांत 24 दिसंबर 1988 को हुआ।
तत्सत रचनाएँ :
परख, सुनीता, त्यागपत्र, कल्याणी (उपन्यास) फाँसी, नीलम, एक रात, दो चिड़ियाँ, जैनेंद्र की कहानियाँ (सात भाग), (कहानी संग्रह) सोच-विचार, जड़ की बात, पूर्वोदय, काम, प्रेम और परिवार (निबंध) प्रेम में भगवान, पाप और प्रकाश (नाटक)
तत्सत विधा-परिचय :
गद्य साहित्य की सबसे प्रिय तथा रोचक विधा ‘कहानी’ को माना जाता है। जीवन का यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं का चित्रण कहानी में होता है। मनोरंजन के साथ-साथ, जीवन में व्याप्त कुप्रथा, गलत रूढ़ियाँ तथा आडंबरों (ostentatious) का पर्दाफाश करते हुए एक नए समाज की स्थापना करना यह उसका हेतु है।
तत्सत विषय प्रवेश :
‘तत्सत’ यह कहानी एक प्रतीकात्मक कहानी है। इस कहानी के घने जंगल में रहने वाले पेड़-पशु-पंछी, जीव-जंतु विशिष्ट प्रवृत्तियों के प्रतीक है। ‘बुद्धि’, ‘शक्ति’, ‘ज्ञान’ के अहंकार में चूर मनुष्य स्वयं को सबसे श्रेष्ठ समझता है।
प्रस्तुत कहानी में लेखक कहना चाहते हैं कि सभी का अस्तित्व, अपनी-अपनी जगह महत्त्वपूर्ण है। हम सभी का अस्तित्व इस सृष्टि के लिए महत्त्वपूर्ण है।
परंतु अंत में उस परम शक्तिमान का अस्तित्व भी स्वीकार करना पड़ता है। जंगल में होने वाली उथल-पुथल भरी घटना का आधार लेकर लेखक यह अंतिम सत्य अर्थात ‘तत्सत’ हम तक पहुँचाना चाहते हैं।
तत्सत सारांश :
एक घना जंगल था। एक दिन उस जंगल में दो शिकारी, शिकार की टोह में आए थे। शिकारी आपस में बोलने लगे कि इतना घना और भयानक जंगल इसके पहले उन्होंने कभी नहीं देखा था। एक बड़े बड़ के पेड़ के नीचे कुछ देर आराम करके वे आगे निकले।
शिकारी लोगों के जाने के बाद बड़ के पेड़ के नीचे बैठे उन प्राणियों के बारे में सब पेड़-पौधों में चर्चा होने लगी। बड़ दादा से अन्य पेड़ों को पता चला कि बिना जड़ वाला सिर्फ दो शाखाओं पर चलने वाला यह प्राणी मतलब आदमी। उन आदमियों ने जिस ‘वन’ का जिक्र किया था वह ‘वन’ मतलब क्या है, कैसा है? उसे किसने देखा है? इस विषय पर चर्चा होने लगी।
जंगल में अनेक पेड़, प्राणी, जीव-जंतु थे। उन सब में उथल-पुथल मच गई थी कि आखिर ‘यह वन कौन है?’ जिसे किसी ने भी देखा नहीं था।
जंगल का राजा सिंह को जब वन के बारे में पूछा गया तो वह जोर से दहाड़ते हुए वन को चुनौती देने की भाषा करने लगा। वनराज सिंह ‘शक्ति’ का प्रतीक है। हर जगह फैलने वाली घास भी ‘वन’ के बारे में नहीं जानती थी। पद-तल के स्पर्श से व्यक्ति की भावनाओं को पहचानने वाली घास ‘बुद्धिमत्ता’ का प्रतीक है।
धरती के सारे गर्त को जानने वाला साँप ‘ज्ञान’ का प्रतीक है। वह भी वन से बेखबर था। ऊँचा बातूनी बाँस अंदर से पोला था, जो ‘पोले’ आदमियों का प्रतिनिधित्व करता है। कहानी का ‘बड़’ संयमी, सहनशील, सबसे प्रेम करने वाला है। वह ज्ञान की लालसा रखता है। सारे वन्यजन ‘वन’ में रहकर भी ‘वन’ के अस्तित्व के बारे में अज्ञानी थे।
‘तत्सत’ का ज्ञान : जंगल के जीव-जंतु परेशान थे। इतने में वहाँ वे आदमी फिर आए। सब उन आदमियों से पूछने लगे कि ‘वन कहाँ है? वन मतलब कौन है? कैसा है?’ आदमी उन्हें समझाने की कोशिश कर रहे थे कि आप से ही वन है। वन्य जीव आदमी की बातें समझ नहीं पा रहे थे।
पशु चिढ़कर आदमी पर हमला करने की सोच रहे थे, आदमी भी सुरक्षा के लिए उनपर बंदूक चलाना चाहता था। परंतु बड़ दादा ने सभी को शांत किया।
अंत में आदमी बड़ के पेड़ पर चढ़ा। पेड़ के ऊपरी हिस्से पर खिलते नए पत्तों की जोड़ी को उसने आस-पास का दृश्य दिखाकर बड़ के कान में कुछ कहा। बड़ को मानो समाधि लग गई। एक नई अनुभूति (sensation) उसे मिली और ‘तत्सत’ का ज्ञान हुआ कि वन में ही हम हैं और हम से ही वन है।
इस कहानी से लेखक कहना चाहते हैं कि सृष्टि की परम शक्ति जिसके अस्तित्व का अज्ञान हम में है। अंतिम सत्य यही है कि ईश्वर या परम शक्ति का अस्तित्व हम में ही है। हम से ही ईश्वर है। ईश्वर हम सब में है। इस कहानी की यही प्रतीकात्मकता है। जंगलवासी और आदमियों के संवाद मानो ‘परम शक्तिमान’ के अस्तित्व के बारे में उलझन और समाधान के बीच की उथल-पुथल है। यह कहानी रोचक तथा प्रभावकारी है।
तत्सत शब्दार्थ :
- तत्सत = वही सत्य है
- सेमर = शाल्मली
- सिरस = शिरीष वृक्ष
- वाग्मी = बातूनी, बहुत बोलने वाला
- तुमुल = घमासान
- मंथर = धीरे-धीरे
- झक्की = सनकी
- गर्त = गड्ढा, खड्ड
- उद्ग्रीव = जिसकी गरदन ऊँची उठी हुई हो
- चरमशीर्ष = उच्चतम
- तत्सत = वही सत्य है (similarly),
- छाँह = छाया (shadow),
- वन = जंगल (forest),
- घना = गर्द (dense),
- रोह = खोज (search),
- गर्त = गड्ढा, उदग्रीव = जिसकी गर्दन उँची उठी हुई हो (raised neck),
- अधीर = उतावली (impatient),
- निर्धम = भ्रम रहित, आशंका रहित (non-fiction),
- वाग्मी = बातूनी (talkative),
- तुमुल = घमासान (boisterous),
Hindi Yuvakbharati 11th Digest Maharashtra Board
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